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भारत में प्रचलित पिरामिडाकार आकृति
     भारत में मिस्र के समान अनूठे पिरामिड देखने को नहीं मिलते, किंतु भारतीय मनीषियों ने मिस्र के पिरामिड निर्माण में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है। मिस्र के पिरामिड पर उनका निर्माण काल, निर्माता एवं कारीगरों आदि के नाम तथा चित्र उत्कीर्ण हैं। समयांतराल के कारण वे कुछ धूमिल हो गये हैं, किंतु ध्यान से देखने पर उन चित्रों में कुछ आकृतियां भारतीयों की जान पड़ती हैं। उनकी वेशभूषा, ललाट तथा भुजाओं पर वैष्णव तिलक स्पष्ट रूप से अंकित हैं।
     भारतवर्ष में पिरामिड का प्रचलन आदिकल से ही रहा है। ऋषि-मुनि वनों तथा पर्वतों से साधना हेतु जो कुटिया बनाते थे, वह भी ठीक पिरामिड के आकार की होती थी। पिरामिडाकार कुटिया में विचित्र शक्तियां खेला करती थी तथा मानसिक रूप से अशांत व्यक्ति भी ऋषि-मुनियों के पास कुटिया में बैठते ही शांति का अनुभव करते थे। इतना ही नहीं कुटिया अथवा पिरामिड के भीतर बैठने, सोने या साधना करने से आज भी अनुकूल वातावरण निर्मित होता है। 

     भारत में पिरामिडाकार के विषय में अत्यंत प्राचीनकाल से ही सम्पूर्ण जानकारी थी। हमारे देश के ऋषि, मुनि एवं तपस्वियों ने इस आकृति का उपयोग मंदिरों, गुरूकुलों आदि स्थानों में आध्यात्मिक ऊर्जा के संचार के लिए किया। ऋषियों की कुटियों तथा आश्रमों की छतें भी इस सिद्धांत के अनुसार ही बनाई जाती थी। पिरामिडनुमा छतें वायुमण्डलिय शक्तियों को आकर्षित करके आश्रमों व कुटीरों में भर देती थी, जिससे उनमें रहने वाले लाभान्वित होते थे। सिर्फ यही नहीं विशेष साधनाओं व तपों केलिए ऋषियों के हिमालय की चोटियों पर जाने की भी परंपरा थी। पर्वतों के भीतर जा पाना तो संभव नहीं था, किंतु पर्वातों की पिरामिडीय संरचना के कारण शक्ति संचयन का सिध्दान्त वहां भी लागू होता था। वे प्रभावित क्षेत्र के निकट किसी गुफा या कंदरा को तप के निए चुनते थे। इससे पर्वत के भीतर जाने के साथ-साथ भूगर्भीय ऊर्जा से भी लाभांवित होने के अवसर होते थे। यह पर्वतों के प्राकृतिक रूप से पिरामिड आकार होने के सिद्धांत से उठाये जाने वाले आध्यात्मिक लाभ थे।
     पिरामिड रूपी संरचना तथा इसके प्रभाव से भारतीय लोग वैदिक युग से ही प्रचलित थे। तभी तो मंदिरों के गुम्बद, गर्भगृह, यज्ञ हेतु वेदी आदी का आकार पिरामिड के समान रहा है। मंदिरों का निर्माण वास्तुशास्त्र के आधार पर किया गया है। मंदिरों में दो मुख्य भाग माने गये हैं- ऊपरी भाग शिखर तथा निचला भाग उप पीठ। शिखर के समान रखा जाता है तथा नक्काशी एवं भव्य कलाओं के द्वारा उसे आकर्षक बनाया जा सकता है। पिरामिड सदृश्य रचना का प्रयोग हमारे वास्तुशास्त्र के अनुसार मंदिरों में देवस्थान में बनाने की प्रथा अति प्राचीन है। भारत में बने विभिन्न प्राचीन मंदिरों की संरचना इस बात का प्रमुख उदाहरण है। जैसे- वेंकटेश्वर भगवान का मंदिर एवं तंजौर का वृहदेश्वर मंदिर आदि। इन मंइिरों का निर्माण वास्तुशास्त्र के अनुसार किया गया है। शायद इसी कारण यह मंदिर विश्वविख्यात है। 

     मंदिरों को पिरामिडनुमा बनाने के साथ ही प्राचीन ऋषियों ने श्रेष्ठ यंत्र बनाया, जो पिरामिड की आकृति का है। इस यंत्र को ‘श्री यंत्र’ के नाम से पुकारा जाता है। श्री यंत्र का अर्थ है- ‘श्री’ का यंत्र अर्थात लक्ष्मी का यंत्र। यह यंत्र अन्य यंत्रों में शिरोमणि माना गया है। श्री यंत्रों में भी ‘मेरूपृष्ठीय श्री यंत्र’ अति उत्तम तथा अति विशेष प्रभावशाली कहा जाता है। क्योंकि उसमें मेरूपृष्ठीय के कारण एक पिरामिड की शक्ति और जुड़ जाती है।
     श्री यंत्र में उर्ध्वमुखी त्रिकोण शक्ति के तथा अधोमुखी त्रिकोण शिव के प्रतीक हैं। ‘श्री यंत्र’ में 108 पिरामिडो (त्रिकोणों) का संचित रूप है। 108 का मूलांक 9 है सबसे बड़ी संख्या है। इस यंत्र में सम्पूर्ण संसार को अपनी ओर आकर्षित करने की अद्भुत क्षमता होती है। आज भी देश के प्रसिद्ध मंदिरों में स्वर्ण शिलाओं पर श्री यंत्र उत्कीर्ण है। सोमनाथ मंदिर के भूगर्भ में, बालाजी में तथा फर्रूखाबाद जिले के मंदिरों में शुद्ध एवं स्पष्ट ‘श्री यंत्र’ उत्कीर्ण है।
     इस प्रकार से हम यह कह सकते हैं कि पिरामिड एक ऐसी संरचना है जिसकी सहायता से हम प्राणवान आकाशीय ऊर्जा को प्राप्त कर जीवन को समृद्धिशाली बना सकते हैं। हिंदू, मुस्लिम, सिख तथा ईसाई सभी के साधना स्थल शक्ति के केंन्द्र हैं। मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा और चर्च को देखने के पर यह सिद्ध होता है कि ये पिरामिडाकृति को ध्यान में रखकर ही बनाये गये हैं।
     विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ विशिष्ट आकृतियों, ढांचों, बनावटों तथा वस्तुओं में उच्च स्तरीय प्राण शक्ति पैदा करने और पिरामिड पदार्थों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने की क्षमता होती है। पिरामिडों में प्रयुक्त पत्थरों में यह क्षमताएं विद्यमान हैं। पिरामिड निर्माण की दिशा सदैव उत्तर-दक्षिण में रखी जाती है। इसी दिशा से पृथ्वी की चुम्बकीय रेखाएं गुजरती हैं। इन सभी कारणों के फलस्वरूप इनकी शक्ति में वृद्धि होती है। पिरामिड आकृति के कारण ही सभी धार्मिक स्थलों में जाकर ध्यान एकाग्र करने से मन में शांति का एहसास होता है और इच्छा शक्ति दृढ़ होती है। यदि इन गुम्बदों (पिरामिड) को उल्टा किया जाये, तो उसकी आकृति हवन कुण्ड के प्रतीत होती है। हवन कुण्ड के द्वारा वायुमण्डल का कण-कण शुद्ध होता है।

     पिरामिड की त्रिकोणाकृति तीन सत्यों को प्रकाशित करती है जिसे निम्नलिखित मंत्र के द्वारा बताया जा रहा है-
                                        असतो मा  सदगमय
                                        तमसो मा ज्योतिर्गमय 
                                        मृत्योर्माऽमृतं  गमय।
     अर्थाम बुरे कार्यों से सद्कार्यों की ओर अग्रसर रहो। पिरामिड शक्ति का केंन्द्र होने के कारण मनुष्य को सद्कार्यों की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करता है। कुछ विशेष अनुसंधानों के अनुसार, विशिष्ट स्थिति एवं उचित आकार में रखने पर पिरामिड के पत्थरों में वस्तुओं को सुरक्षित तथा प्राणवर्धक बनाने की अदम्य क्षमता विकसित होती है इसी कारण पिरामिड में शक्ति उत्पन्न होकर संरक्षण प्रदान करती है। भारत में पिरामिडीय शक्तियों के सिद्धांत का पालन अब भी नये बनने वाले मंदिरों में भी होता रहा है। 
     पिरामिडीय शक्तियों का अधिक व्यापकता व सूक्ष्म स्तर तक उपयोग भारत में हुआ है। इसका एक और उदाहरण राजाओं, महाराजाओं तथा देवताओं द्वारा सिर पर धारण करने वाले मुकुट हैं। शांति, सुरक्षा, स्थासित्व, स्थिरता तथा शुभत्व के प्रभाव को धारण करने वाले व्यक्ति में- अपनी सूच्याकार त्रिकोणीय/शंकु आकारीय संरचना के कारण प्रविष्ट करती थीं। मुकुट न धारण करने वाले ऋषि अपनी जटाओं को सूच्याकार रूप में लपेटकर सिर के मद्ध में धारण करते थे।  
     ऋषि-मुनि तो विद्वान थे, परन्तु भारतवर्ष के ग्रामों में निरक्षर लोग भी पिरामिड का महत्व जानते थे। ईंधन के रूप में प्रयोग किये जाने वाले उपले ग्रामीण जन पिरामिड के आकार की घास-फुस तथा गोबर से पोतकर बनाई गयी कुटिया (बिटोरा) में ही रखते हैं। जिससे वर्षा-ऋतु का उपलों पर कोई प्रभाव नहीं वल्कि भारतवर्ष में भी पिरामिडाकार की उपयोगिता आदिकाल से ही रही है। भारतीय वास्तुकारों, शिल्पकारों तथा ऋषियों ने पिरामिडों का विविध रूप में प्रयोग किया है और पिरामिड शक्ति व ऊर्जा का पूर्ण लाभ उठाया है। यह बात अलग है कि हमारे भारत में पिरामिड आकृतियों का प्रयोग कब्रगाह के रूप में नहीं हुआ है क्योंकि यह हमारे धर्म, सभ्यता और आध्यात्म के अनुकूल नहीं है। 
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