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पिरामिड पर अनुसंधान
     पिरामिड की क्रियाविधि को पूरी तरह से समझने के लिए निरंतर वैज्ञाानिक अनुसंधान कर रहे हैं, पंरतु इस अबूझ से रहस्य से कोई भी पूरी तरह पर्दा नहीं उठा सका है। पंरतु एक बात से सभी वैज्ञानिक एकमत हैं कि भले हही पूरी तरह से इसकी क्रियाविधि की विवेचना नहीं की जा सकी, परंतु इस आकृति में अदृश्य ब्रह्यांडीय ऊर्जा के गुणात्मक विस्तार की शक्ति छिपी हुई है।


     गीजा के महान पिरामिड का अध्ययन करने से वैज्ञानिकों के सामने अधिक चैंकाने वाले तथ्य आये हैं। उसके आधार का क्षेत्रफल निकालकर, गुण-भाग करने पर जो योगफल प्राप्त होता है वह गणितीय स्थिरांक ‘पाई’ (3143) के मान के बराबर आता है। इसी प्रकार उसकी ऊँचाई के लाख गुणा करने पर पृथ्वी से सूर्य की दूरी 9 करोड़ 30 लाख मील प्राप्त होती है। सूर्य की ऊर्जा कुल दमरी के लाख  वें हिस्से में सबसे अधिक संकेन्द्रित होती है। पिरामिड के मध्य कर उत्तर-दक्षिण अक्ष सम्पूर्ण पृथ्वी को ठीक दो भागों में बांटता है, साथ  ही पृथ्वी के जल और स्थ्ल को ठीक आधा कर देता है। इससे स्पष्ट है कि पृथ्वी के गोलाकार होने का पिरामिड निर्माण- कत्र्ताओं को  पूरा ज्ञान था। पिरामिड गुरूत्वाकर्षण केेंद्र के ठिक ऊपर स्थित हैै। इसका पादाधार 635600 मीटर है, जो पृथ्वी के अर्द्धव्यास का ठीक दसवां  भाग है। वर्ष में 365 दिन होते हैं, इसका सौ गुणा कर, उसमें एक दिन के 24 घंटे जोड़ने पर योग 36524 होता है; यह मीटर में पिरामिड के आधार की परिधि है।
     प्रसिद्ध खगोलविद् चाल्र्स पियाजी स्मिथ ने कहा था कि पिरामिड वह रहस्मयी संरचना है, जिससे पृथ्वी का द्रव्यमान और परिधि तथा सूर्य से पृथ्वी की दूरी का पता लगाया जा सकता है। इसकी सहायता से पाई का सही मान भी ज्ञात किया जा सकता है। जैसे-जैसे खोजकर्ता जानकारी प्राप्त करते गये, इस खगोलविद् की बात सत्य साबित होने लगी।
     पिरामिड केढलान का कोण 51 डिग्र्र्र्र्री और 51 मीटर ही क्यों रखा गया? इस तथ्य का अनुमान प्रसिद्ध खोजकत्र्ता जाॅन टेलर अनुसार ये अंक विशेषतौर पर इसलिए चुने गये कि पिरामिड की प्रत्येक दीवार की सतह का क्षेत्रफल उसकी लंबाई (लम्बवत् ऊँचाई) के वर्ग के बराबर होता है। 
     अनुसंधानकत्र्ता मानते हैं कि ब्रह्यांड में उपस्थित अनेकों-अनेक तारे जो पृथ्वी के समीप स्थित हैं, उनसे कई प्रकार के विकरण  पृथ्वी पर गिरती हैं तथा अंतरिक्ष में सदैव एक  विशेष प्रकार की ब्रह्यांडीय वायु चलती रहती हैं जो पृथ्वी पर अपना प्रभाव डालती हैं।

     ऊर्जा, से पिरामिड में स्थित अणुओं, उनके परमाणुओं तथा उनमें उपस्थित इलेक्ट्राॅनों को अतिरिक्त ऊर्जा प्राप्त होती है, जिससे इलेक्ट्राॅन अपनी कक्षाओं को छोड़कर निकल जाते हैं, जिससे इस क्षेत्र में अदृश्य परणुवीय ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही ऊर्जा पिरामिड के कोने से बाहर निकलकर चारों ओर का वातावरण आवेशित कर देती है।
     इसी परिकल्पना के आधार पर अनुसंधान कत्र्ता ने कुछ निश्चित आकर के पिरामिड बनाकर एक लकड़ी की एक पेटी में रखे तथा उसे पिरामिड एनर्जी जेनरेटर का नाम दिया। नियमित इस यंत्र पर बैठकर ध्यान करने से यह पाया गया कि इस पर बैठने से मनुष्य अधिक शांत, एकाग्र एएवं तन्मय होकर ध्यान कर पाता है। कुछ देर इस पर बैठने ने से तनाव रहित अनुभव करता है।
     पिरामिड पर दिन-प्रतिदिन नये-नये-नये अनुसंधान हो रहा हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथों के अनुसार यह व्याख्या की जाती है कि त्रिकोण को अग्नि तत्व का प्रतीक माना गया है। अग्नि जहां जीवनी शक्ति है वहीं ऊर्जा का स्रोत भी है। पिरामिड का आकर भी उध्र्वमुखी त्रिकोण की ही तरह है। पिरामिड क ेलिए प्रसिद्ध मिस्रवासी भी इसके केंद्र में अग्नि तत्व को ही स्वीकार करते हैं। इससे यह विकसित पिरामिड विज्ञान का मूल स्रोत भारत से संबंधित अवश्य है।        

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