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पिरामिड शक्ति व संरचना
     भारत के प्राचीन ऋषि-मुनि तथा तत्व वेत्ताओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि सर्वाधिक ऊर्जा त्रिभुज तथा उसके केंद्रों से उपजती है। इसी कारण त्रिभुज को शक्ति का स्रोत माना गया है। पिरामिड चूंकि चार त्रिकोण से बनी आकृति है। अतः यह स्वाभाविक है कि जिस वस्तु या आकृति में चार त्रिकोणों से संलग्न प्रतिमा बनेगी वह चार गुनी स्थिरिता प्रदान करेगी। अतः पिरामिड जो चार संलग्न त्रिकोणों का प्रतीक है, स्थिरता प्रदान करने वाला है। पिरामिड के दो कोण नींव से 58 डिग्री तथा तीसरा कोण शिखर पर 64 डिग्री पर होता है। चार त्रिभुजाकारी दिशाएं शक्ति का प्रसार करती हैं वर्गाकार नींव ऊर्जा का प्रसार करती है।     
     पिरामिड की त्रिकोण आकृति का मध्य कोण अत्याधिक महत्वपूर्ण है, जिसके मध्य में अग्नि का वास है। अंदर से खोखला होने के कारण शुद्ध वायु को अपने अंदर एकत्रित रखता है, जिससे पिरामिड के नीचे वस्तुएं अधिक समय तक सुरक्षित रहती हैं। किसी दिशा विशेष में दोष होने पर उस दिशा में ऊर्जा को बढ़ाने के लिए इनका प्रयोग किया जाता है।
     पिरामिड में किसी भी पदार्थ के मूल कणों का विखंडन नहीं होता। पदार्थ यथावत और उपयोगी बना रहता है। यह जिस स्थान पर हौगा वहां विखंडन, बिखयाव एवं अलगाव नहीं होगा। साथ ही यह व्यवसायी को अक्षुण्ण रखता है। इसमें किसी भी पदार्थ के बिखरेे कणों को पुनः शक्तिकृत करने की क्षमता होती है। इसीलिए इसका उपयोग वास्तु और व्यक्ति पर किया जाय तो वह चमत्कारी 

     परिणाम प्रदान करता है साथ ही व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक शक्ति को क्षीण होने से बचाता है तथा उसे स्वस्थ और दीद्र्यायु बनाये रखता है। इसमें कोई भी दूषित तत्व या दुर्गंध नहीं रह पाती। किसी भी तरह का वास्तु दोष हो या व्यक्ति का स्वास्थ्य खराब हो, तो पिरामिड से उस दोष का निवारण निश्चय ही होता है।
     पिरामिड में चार त्रिकोेणों के कारण स्थिरता व प्रगतिशीलता चैगुनी हो जाती है। कोई भी अन्य आकृति दवाब से आकार बदल देती है जौसे - गोलाकार वस्तु दवाब से अंडाकार हो जाती है लेकिन त्रिकोण किसी भी स्थिती में त्रिकोण ही रहेगा। इसलिए त्रिकोण को स्थिरता का सूचक माना गया है।
     पिरामिड अनंत ऊर्जा का भंडार है। पिरामिड को उसकी विशेष संरचना से प्राप्त होती है। पिरामिडाकार अलौकिक ऊर्जा का यंत्र है। पिरामिड मानव की अंतर्निहित ऊर्जा को विद्युतीय ऊर्जा द्वारा प्रभावित करता है। पिरामिड से सूक्ष्म तरंगें निरंतर प्रवाहित होती रहती है। पिरामिड  की शक्ति एवं रहस्य भौतकतावादी तो है ही, इसका संबंध आत्मा व मन के साथ भी है। पिरामिड आत्मा व मन को सीधे प्रभावित करता है। पिरामिड का विषय हमेशा से मनुष्यों के लिए एक रहस्यपूर्ण पहेली के रूप में रहा है। पिरामिड की शक्ति व संरचना के विषय में समय-समय पर वैज्ञानिकों ने व पुरातत्वविदों ने खोज व अनुसंधान किये हैं, फिर भी काफी कुछ ऐया है जो अब भी परीक्षण के योग्य हैं। वैाानिकों के अनुसार पिरामिड में असीमित ऊर्जा शक्ति है।। जिस प्रकार पिरामिड की विद्युत चुम्बकीय शक्तियां केंद्रीभूत होकर अंदर रखे पदार्थों का विकेंद्रीकरण करके उन्हें आस-पास के वायुमंडल में प्रसेरित करती है। जिससे वातावरण शुद्ध एवं प्रदूषण रहित होता है। मिस्र में पिरामिड एक विशेष माप व अनुपात में बनाये जाते हैं। जिन्हें यदि उत्तर-दक्षिण दिशा में रखें तो खाद्य पदार्थों को भी अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

     पिरामिड एक विशेष प्रकार की आकृति व संरचना है। जो सूर्य और बाह्य अंतरिक्ष से पृथ्वी तक पहुंचने वाली ब्राह्यण्डीय ऊर्जा से स्पंदित होता है। पिरामिड, ब्राह्याण्डीय ऊर्जा से छह दिशाओं में परस्पर क्रिया करता है- चारों ओर की ऊर्जा, ऊपर स्वर्ग और पृथ्वी से। इसमें वर्गाकार आकार पृथ्वी का प्रतिरूप है और शीर्ष आकार का प्रतिनिधि। त्रिभुजाकार सतह से चारों ओर की प्रक्रिया होती है। पिरामिड सभी ब्रह्याण्डीय ऊर्जा का सूक्ष्म संसाधन है। पिरामिड सूर्य, चंद्र्र और अन्य ग्रहों की बरसती हुई ऊर्जा तथा पृथ्वी की उध्र्वगामी ऊर्जा से सभी कार्य करता है। इन सभी ऊर्जा का मिलन केंद्र मध्य बिंदु है।
     पिरामिड चार समद्विबाहु त्रिभुजों से बनी एक आकृति है। इसके चारों त्रिभुज चारों दिशाओं की ओर इंगित करते हैं। ये चारों दिशाओं के प्रतीक भी माने गये हैं यह संरचना ऊर्जा और शक्ति का केंद्र है जिससे सभी दिशाओं में निरंतर ंऊर्जा प्रवाहित होती रहती है।
     पिरामिड में समाहित पंचतत्व: मानव शरीर पांच तत्वों-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश से मिलकर बना है। जब तक मनुष्य जीवीत रहता है, तब तक पंचतत्व उयमें समाहित रहते हैं। लेकिन जब मृत्यु हो जाती है मनुष्य इनमें समा जाता है अर्थात्् मृत्यु के पश्चात् भी मनुष्य का संबंध पंचतत्वों से बना रहता है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना इन पांच तत्वों से की है। तात्पर्य यह है कि सृृष्टि निर्माण का आधार पंचतत्व है। यही पांचों तत्व भारतीय वास्तुशास्त्र के चिंतन के आधार स्तम्भ हैं।
     मनुष्य जीवनभर पंचतत्वों का उपयोग करता है, इसलिए ये मनुष्य के लिए अतिमहत्वपूर्ण हैं। पांचों तत्वों के उचित सम्मिश्रण से ‘बायो इलेक्ट्रिक एनर्जी’ उत्पन्न होती है, जो मनुष्य को स्वास्थ्य और धन-वैभव प्रदान करती है। धरती पर पांचों तत्व अनिवार्य हैं। यदि इनमें से किसी भी एक में कमी आ जाय तो मनुष्य का प्राप्त होने वाले लाभों में कटौती हो जाती है। अतएव हमें इपने हमें पर्यावरण की देखभाल करनी चाहिए। पर्यावरण संतुलन से ही पंचतत्व संतुलित रह यकते हैं।

     घर में पिरामिड की स्थापना करके भी पंचतत्वों में सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। पिरामिड का ऊपरी सिरा आकाश का तथा निचला सिरा पृथ्वी और जल का द्याोतक है जबकि त्रिकोण का मध्य भाग अग्नि का केंद्र होता है। पिरामिड में पंचतत्वों का समावेश माना जाता है। इसके सही उपयोग से मनुष्य सुखी तथा समृद्धिशाली बन सकता है। 
     मानव ब्रह्याण्ड की सूक्ष्म अनुकृति है। प्राचीन मिस्र की गहन रेखागणित के अनुसार पिरामिड के अंदर के भाग में सम्पूर्ण ब्रह्याण्ड समाया हुआ है। पिरामिड मानव शरीर की संरचना के अनुरूप बनाया गया है। भारतीय ब्रह्यांड विज्ञान की अवधारणा के अनुसार पुरूष उसके केंद्र में है। मानव शरीर पांच मूल तत्वों से निर्मित है इसलिए वास्तु भी मनुष्य के अनुरूप होना चाहिए। मनुष्य पंचमहाभूत तत्वों सप्त ऊर्जा  चक्रों से नियंत्रित है। इस तरह ब्रह्यांड में मनुष्य और वास्तु शिल्प का मधुर संबंध हमारे पंच तत्वों एवं सप्त ऊर्जा केंद्रों में आवश्यक युति का निर्माण करता है। ब्रह्यांड की यह सूक्ष्म अनूकृति पिरामिड, संबंधित पदार्थ या कोशिकाओं एवं की पूर्ति कर सकता है।
     एक महान वैज्ञानिक के विचार कुछ इस प्रकार से हैं-
     ‘‘ पिरामिड के विशेष ज्यादा आकार के फलस्वरूप उसके पांचों कोनों में एक विशेष प्रकार की किरणोत्सर्ग पैदा होती है, जो ऊर्जा के रूप में पिरामिड की एक-तिहाई ऊँचाई पर स्थित किंग्स चैम्बर में इकट्ठी हो जाती है।
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